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आपातकाल -५ : गूँगी बस्ती , बहरे लोग

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२५ जून १९७५ को सुबह ६ बजे केन्द्रीय मंत्रिमंडल की एक बैठक बुलाई गयी | मंत्रियो को बता दिया गया कि मध्यरात्रि के बाद से देश में आपातकाल लगा दिया गया है | मंत्रियो की पलकें नींद से मुंदी जा रही थी और उन्हें इस घोषणा की उम्मीद नहीं थी | देश को यह सूचना देने से पहले मंत्री मंडल की महज औपचारिक सहमति भर ले ली गयी | इसके बाद श्रीमती गांधी आल इंडिया रेडिओ की ओर रवाना हुई , जहाँ से यह सूचना वह पूरे देश को देने वाली थी | यहाँ से उन्होंने जनता को बताया कि घबराने की कोई बात नही है , देश को विखंडन से बचाने के लिए और साम्प्रदायिकता से मुकाबले के लिए यह आतंरिक आपातकाल लगाया गया है जिसे उचित समय आने पर जल्द ही हटा लिया जाएगा |

    २४-२५ की रात असल में क्या हुआ था , इसका विवरण पत्रकार ड़ी. आर. मानकेकर अपनी पुस्तक डिक्लाइन एंड फाल आफ इंदिरा गांधी में विस्तार पूर्वक करते है -”जैसे ही अन्धेरा छा गया ( २५ जून को ) , ८.३० बजे रात को श्रीमती इंदिरा गांधी सिद्धार्थ शंकर रे के साथ वाहन में बैठ कर आतंरिक आपातकाल घोषित करने के अपने महत्वपूर्ण निर्णय के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को अनौपचारिक तौर पर सूचित करने के लिए गयी थी | रात के ११.३० बजे उनके निर्णय से अवगत कराने के लिए रेड्डी को प्रधानमंत्री आवास पर बुलाया गया | ( राष्ट्रपति के हस्ताचार होने के पूर्व तक गृहमंत्री ब्रह्मानन्द रेड्डी तक को इस बारे में कुछ पता नही था ) ओम मेहता ( गृह मंत्रालय में उपमंत्री ) , जो प्रधानमंत्री की हर गतिविधि की जानकारी रखने वाली हस्ती थे को छोड़ कर किसी कैबिनेट मंत्री को उस रात इस बारे में पता नही चला | अगले दिन सुबह ६ बजे देश में आपातकाल की घोषणा के निर्णय से अवगत कराने के लिए कैबिनेट की बैठक बुलायी गयी | ” कुलमिला कर यह निर्णय बहुत गुपचुप तरीके ( इस बारे में प्रकाशित अबू जानी का एक कार्टून बाथटब ह्यूमर बहुत प्रसिद्द हुआ ) से हुआ था और नए शोधो से पता चलता है की इसमें श्रीमती गांधी उनके छोटे पुत्र संजय गांधी , सिद्धार्थ शंकर रे ( प. बंगाल के मुख्यमंत्री और प्रधानमन्त्री के ख़ास मित्र जो अपने पत्रों में उन्हें प्रिय इंदिरा कह कर संबोधित करते थे |) देवकांत बरुआ ( तत्कालीन कांग्रेस अद्याच्ख ) और रजनी पटेल भर शामिल थे |
    इमरजेंसी !
    उजाला कहाँ है ?
    न दिल में , न घर में ,
    न इस रास्ते पर ,
    न उस रहगुजर में ,
    उजाला कहाँ है ?
    उजाला कहाँ है ?

    यहाँ से वहाँ तक,
    अंधेरे का एक सिलसिला है,
    अंधेरा ,
    जो पिछले अंधेरो से बिलकुल अलग ,
    तजरबों से जुदा है,
    अंधेरा , जो शायद बस एक पल है ,
    लेकिन , यह पल भी ,
    गुजश्ता सदी से बड़ा है ,
    सलीबो के मानिन्द दिल में गड़ा है,
    यकीं है की इस दर्दे-तारीक का भी मदावा तो होगा,
    मदावा किधर है ?
    मसीहा कहाँ है ?
    उजाला कहाँ है ?
    उजाला कहाँ है…………

      ( कटरा बी आरजू : डा, राही मासूम रजा )

    पूरे देश में आधी रात से ही गिरफ्तारियां शुरू हो चुकी थी | जे. पी. को घोषणा होते ही गांधी शान्ति प्रतिष्ठान से निरुद्ध कर लिया गया | मोरार जी , चरण सिंह भी गिरफ्तार कर लिए गए | दूसरे दिन सुबह – सुबह बंगलौर से अटल बिहारी बाजपेई , आडवाणी को समाजवादी नेता मधु दंडवते के साथ गिरफ्तार कर लिया गया | कांग्रेस (ओ ) के नेता श्याम नंदन मिश्र भी बंगलौर से ही पकडे गए | कांग्रेस से निष्काषित नेता रामधन , सोशलिस्ट पार्टी के वृद्ध नेता समर गुहा और मधु लिमये , लोक दल के रवि राय और राज नारायण , डी. एम्. के. नेता मुरासोली मारन और सी. पी. आई. . के ज्योति बसु आदि देश के लगभग तीस वरिस्ठ नेता अब जेल में थे | यहाँ तक की कांग्रेस के स्वतंत्र व्यक्तित्व वाले नेताओं – चंद्रशेखर और मोहन धारिया को भी नहीं बख्शा गया | हलाँकि विद्रोही मजदूर नेता और डाइनामाईट काण्ड के मुख्य आरोपी जार्ज फर्नांडीज बहुत बाद में पकडे जा सके जबकि सुब्रमनियम स्वामी अंत तक निरुद्ध नही किये जा सके | ( स्वामी विदेश चले गए थे , यधपि आपातकाल के बीच में ही वह भारत आये , राज्य सभा के सत्र में भाग ले कर ‘ लोक तंत्र की म्रत्यु पर उसे श्रद्धांजलि ‘ का प्रस्ताव किया और पुलिस को चकमा देते हुए पुनः विदेश चले गए ) एक अनुमान के मुताबिक़ बिना सुनवाई के करीब ३६,००० लोगो मीसा में बंद कर दिए गए | इन कैदियों में लगभग सभी राज्यों की नुमांइदगी थी | आन्ध्र प्रदेश से १०७८, बिहार से २३६० , उत्तर प्रदेश से ७०४९ प. बंगाल से ५३२० राजनीतिक जेलों में बंद थे | इसी तरह दूसरे राज्यों से भी हजारों लोग बंद थे | ( यह संख्या राम चन्द्र गुहा ने अपनी पुस्तक में एक विश्वनीय स्रोत से ले कर दी है | ) पूरे देश में जिस पर भी इंदिरा जी के विरोधी विचार रखने का शक था वह सखींचो के पीछे कर दिया गया | इन कैदियों को कोई राजनीतिक दर्जा भी नही दिया गया था |उन्हें चोर , उठाईगीरो और गुंडों की तरह बस जेल में ड़ाल दिया गया था | इससे उस समय एक चुटकुला प्रचलित हो गया कि इंदिरा गांधी का समाजवाद कम से कम जेल में तो देखने को मिलता है | राजनीतक गिरिफ्तारियो में लोगो के पद और प्रस्थिति का भी ध्यान नहीं रखा गया | जयपुर की राजमाता गायत्री सिंह और ग्वालियर की राजमाता विजया राजे सिंधिया तक को गिरिफ्तार कर अत्यंत अस्वास्थ्यकर दशाओ में रखा गया | मीसा ( जिसे उस समय इंदिरा-संजय सुरक्षा कानून कहा जाने लगा था | )के अलावा इन भद्र महिलाओं पर चोरी और तस्करी की धारांए लगायी गयी थी | समाजवादी नेत्री मृणाल गोरे को बगल की कोठारी में रहने वाली एक कुष्ठरोग पीड़ित महिला के साथ शौचालय प्रयोग करने को कहा गया | सामने वाली कोठरी में एक मिर्गीग्रस्त महिला रहती थी , जो प्रायः वस्त्रहीन रहती थी और हर समय चीखती – चिल्लाती रहती थी | सरकार ने चंडीगढ़ में नजरबन्द किये गए जे.पी. को उनके मनपसंद सहयोगी के साथ रहने से मना कर दिया था जबकी अंग्रेजीराज में भी सरकार ने उनकी लोहिया के साथ रहने की इच्छा पूरी की थी | न्यूयार्क टाइम्स के संवाददाता ए. एम. रोजेंथल ने उस समय लिखा था -”इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री आवास में है , जबकि जवाहरलाल उन्हें जेल से चिट्ठियां लिख रहे है |]

      लेखमाला की इस कड़ी का अंत मैं इतिहासकार रामचंद्र गुहा की कतिपय टिप्पड़ियो के साथ करुंगा – ” आपात काल के तुरंत बाद से श्रीमती गांधी साक्षात्कारों और भाषणों में अनुशाशन और नैतिकता पर जोर देने लगी | नए-नए नारे गढ़े गए जिनकी बानगी कुछ इस प्रकार थी – अनुशाशन ही देश को महान बनाता है , बाते कम काम जादा , स्वदेशी खरीदे- भारतीय बने , हमारी क्षमता ही हमारा आदर्श है , आदि-आदि | उनके व्यक्तित्व और नेत्रित्व के बारे में भी नारे दिए गए मसलन – वह व्यवस्था और अराजकता के बीच दीवार की तरह खडी हो गयी , हिम्मत और साफ़ दृष्टिकोण का दूसरा नाम इंदिरा गांधी है | ये नारे पूरे देश में सरकारी इमारतों और पुलों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिए गए | बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर भी इस तरह के नारे लिखे गए |
      ये तानाशाही के साफ़ लक्षण थे |जिस तरह एक सैनिक शाशक , तख्तापलट के बाद अपने देश को बचाने का दावा करता है , श्रीमती गांधी उसी तरह से कर रही थी |ठीक उसी तरह से वे कह रही थी चूंकी उन्होंने अपनी जनता से आजादी छीनी है , वे उसके लिए भोजन का इंतजाम करेगी |आपातकाल को लागू हुए सप्ताह भर भी नहीं हुआ था कि उन्होंने आर्थिक विकास का एक बीस सूत्रीय कार्यक्रम प्रस्तुत कर दिया |
      इतिहास में महिला तानाशाहों की संख्या उंगली पर गिनने लायक है | शायद बीसवी सदी में इंदिरा गांधी पहली महिला तानाशाह थी | महिला होने के नाते उन्होंने बिम्बों और प्रतीकों का भरपूर उपयोग किया | ”
      ( क्रमशः )

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