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आपातकाल - ६ : इन्दू जी , इन्दू जी - क्या हुआ आपको !

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    आम तौर पर यह मान्यता है कि प्रारम्भिक दिनों में सामान्य जनता ने आपातकाल का स्वागत किया | जिस दिन आपातकाल की घोषणा हुई ब्रिटिश पत्र संडे टाइम्स के संवाददाता जोनाथन ड़िंवलेबी ने लिखा – ” दिल्ली की सड़कों पर सन्नाटा छाया हुआ है | कामकाजी लोगों का झुण्ड अन्य दिनों की तरह सवेरे – सवेरे साइकिल पर सवार हो कर काम पर रवाना हो गया | सरकार के खिलाफ नारा लगाती हुई कोई भीड़ जमा नहीं हुई | दुकानें और कारखाने अन्य दिनों की भाँति ही खुल गए | अमीरों की जिन्दगी वैसी ही कटती रही | ” वरिष्ठ पत्रकार इन्दर मल्होत्रा इंदिरा गांधी की एक जीवनी में लिखते है – ” आपातकाल के शुरुवाती महीनों में हिन्दुस्तान में जो शान्ति थीं , वह उसने बरसों से नही देखी थी | ”
    इन शुरुवाती दिनों में हिन्दुस्तान में वाकई शान्ति दिखायी दी | रेलगाड़िया अब समय से चलने लगी थीं , लोग कार्यालयों में समय से आने लगे थे , हड़ताले होना बंद हो गयी थी , अपराधो की दर कम हो गयी और उस साल मानसून के अच्छा रहने से खाधान्न की कीमतें भी नहीं बढी | इस सन्दर्भ में श्री लाल कृष्ण आडवानी ने अपनी पुस्तक ‘मेरा देश , मेरा जीवन ‘में प्रसिद्द विचारिका व शिक्षाविद् मारिया मांटेसरी का एक कथन प्रस्तुत किया है , जो अत्यंत समीचीन है – “अनुशाशन स्वतंत्रता के साथ आना चाहिये | हम उस व्यक्ति को अनुशाशित नहीं मान सकते , जो कृतिम रूप से चुप या मूक है और एक लकवाग्रस्त की तरह विकलांग है | वह व्यक्तिगत रूप से भाव शून्य है ना कि अनुशाशित | इंदिरा गांधी द्वारा अनुशाशन की बात लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने , न्यायपालिका की बेड़ी में कसने और संविधान को दुर्बल करने का एक बहाना है ” ( पृष्ठ १८६ )

सच पूछे तो जनता की यह खामोशी शान्ति नहीं बल्कि सन्नाटा थी और बाद की घटनाओं ने इसे सही भी सिद्ध किया | यदि केवल शान्ति और व्यवस्था ही सुशाशन का आधार होते तो हर तानाशाह का शाशन उत्तम की श्रेणी में आता | उदारवाद और लोकतंत्र का मूलभाव स्वतंत्रता में छिपा हुआ है ना कि शान्ति और व्यवस्था में | शान्ति – व्यवस्था, स्वतंत्रता के साथ ही सुशोभित होती है एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में निरपेक्ष रूप से ये अधिक महत्व नहीं रखती | भारतीय जनता के स्वभाव और चरित्र का कोई भी निष्पक्ष प्रेक्षक यह निष्कर्ष नही प्राप्त कर सकता कि आपातकाल के प्रारम्भ में ही भारतीय जन विद्रोह की मुद्रा में आ जाता , इससे संतुष्ट वही था जिसे यथास्थिति से लाभ प्राप्त हो रहा था उदाहारण के लिए भारत का पूजीपति वर्ग और भ्रष्ट अधिकारतंत्र | प्रसिद्ध पूंजीपति जे. आर. डी. टाटा ने न्यूयार्क टाइम्स के संवाददाता जे. अंथनी लुक्कास से उस समय कहा था – ” आप कल्पना नहीं कर सकते कि हम किन हालातो से गुजरे हैं | पहले अक्सर हड़ताल , बहिष्कार और प्रदर्शन हुआ करते थे | हालात यहाँ तक खराब थे कि मैं अपने कार्यालय से गली में नहीं निकल सकता था | ” ( क्या वाकई हालात ऐसे थे ? ) उन्होंने आगे कहा -“संसदीय व्यवस्था हमारी जरूरतों के हिसाब से सही नहीं है |” दिल्ली के एक नौकरशाह ने इसी पत्रकार से कहा कि केवल विदेशो में रहने वाले लोग ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी चीजों की वकालत करते हैं,वक्त आ गया है कि अब हम आर्थिक विकास के लिए अपने निजी हितो का बलिदान कर दे |
विदेशी मीडिया में श्रीमती गांधी के इन प्रयासों की आलोचना काफी पहले से शरू हो गयी थी | पश्चिमी मीडिया और राजनीतिक समाज में इस समय तीन तरह के मत सामने आये- प्रथम , श्रीमती गांधी ने जो किया वह समयोचित और भारत को विखंडन से बचाने के लिए जरुरी था | भारत में स्थिति उतनी खराब नही है जितनी प्रचारित की जाती है | १९७५ में टाइम्स पत्रिका के एक संवाददाता ने इमरजेंसी : ए नीडेड शाक शीर्षक लेख में लिखा – प्रधानमंत्री ने सामाजिक क्षेत्र में सुधार कर के जनता के एक बड़े हिस्से का समर्थन प्राप्त क़र लिया है | पूरे देश में इस समय अनुशाशन , स्वछता , समय की पाबंदी और अच्छे आचरण के लिए अभियान चलाया जा रहा है | इसी तरह इंग्लैंड के लेबर सांसद माइकल फूट , जेनी ली ,टोरी नेता मारग्रेट थेचर कंजरवेटिव सांसद एल्डन ग्रिफिथ ने भी भारत में आपातकाल का समर्थन किया | ( इस पर प्रसिद्द राजनीतिक विचारक मारिस जान्स ने व्यंगपूर्ण टिप्पड़ी की कि इस तरह का सरलीकरण एक ऐसा खेल है जिसका धुर – साम्राज्यवादी टोरी और क्रांतिकारी मार्क्सवादी दोनों ही सामान रूप से आनंद उठाते है | ) दूसरी धारा उन लोगो की थी जो मानते थे कि भारत का वातावरण कभी लोकतंत्र के लिए उपयुक्त था ही नहीं तीसरी धारा आपातकाल के विरोध में थी | जर्मनी के चांसलर विली ब्रांड और शोशलिस्ट इंटरनेशनल ने इसका कडा विरोध किया | ( हिन्दुस्तान के लिए सभी समाजवादियो को निजी तौर पर दुखी होना चाहिये ) जिनेवा के वर्ड कौंसिल आफ चर्चेज ( यह मानवाधिकार का गंभीर हनन है |) और अमेरकी मजदुर संगठन एएफएलसीआईओ ( भारत एक पुलिस राज्य में तब्दील हो गया है , जिसमे लोकतंत्र को कुचल दिया गया है |)ने भी भर्त्सना की |

१५ अगस्त १९७५ को द टाइम्स आफ लन्दन में फ्री जे. पी. कैपेंन नाम से पूरे पन्ने का विज्ञापन छपा| इस विज्ञापन का खर्चा कई लोगों ने मिल कर उठाया | इस पर हस्ताक्षर करने वाले लोगो में अर्थशास्त्री इ. एफ . सुमेकर , राजनीतिशाश्त्री मोरिस जांस , इतिहासकार ए. जे. पी. टेलर , समाजवादी फेनर ब्रोक्वे , आलोचक केनथ टेनन , अभिनेत्री डेम पेगी और ग्लेन्डा जेक्सन आदि शामिल थे | महात्मा गांधी और जय प्रकाश नारायण की तस्वीर वाले इस विज्ञापन में कहा गया था कि आज भारत का स्वतंत्रता दिवस है , कृपया भारत के लोकतंत्र पर से ये प्रकाश मत ख़त्म होने दीजिये |

    इधर कुछ समय बाद भारतीय जनता की खामोशी भी टूटने लगी और एक बार जब वह टूटना शरू हुई तो चकनाचूर होने की हद तक जा पहुची | 14 नवम्बर १९७५ को जवाहर लाल नेहरु के जन्म दिवस पर लोक संघर्ष समिति नामक एक संस्था ने मुम्बई में सत्याग्रह शरू किया |हर रोज शहर के किसी व्यस्त चौराहे पर एक नया जत्था आता और ‘ तानाशाही मुर्दाबाद – जे. पी. जिंदाबाद ‘ के नारे लगाता | एक माह के अन्दर १४६ महिलाओं सहित १३५९ लोग गिरिफ्तार किये गए |धीरे-धीरे यह आग देश के अन्य भागो में भी फैल गयी ,द इकोनामिस्ट के २४ जनवरी ७६ के अंक में छपी खबर के अनुसार सत्याग्रह शुरू होने के तीन माह के भीतर कम से कम ८०, ००० हजार लोग निरुद्ध किये गए | हो सकता है कि यह खबर अतिरंजित हो पर एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में छपी इस खबर से स्थिति की गंभीरता का अंदाजा भली- भांति लगाया जा सकता है |

    १५ अगस्त १९७६ को एक दूसरा सत्याग्रह प्रारंभ हुआ | इस बार सत्याग्रह का नेत्रित्व मणिबेन पटेल ने किया जो सरदार बल्लभ भाई पटेल की पुत्री थी | लगभग ५० सत्याग्रहियों का एक दल अहमदाबाद से एतिहासिक स्थल दांडी की ओर रवाना हुआ | सत्याग्रही आपात काल हटाने और राजनीतिक कैदियों को मुक्त करने की मांग कर रहे थे | प्रारभ में मणिबेन को गिरिफ्तार कर लिया गया किन्तु बाद में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और प्रतिष्ठा को देखते हुए सरकार को उन्हें छोड़ना पडा | अनंतर मणिबेन ने अपनी यह विरोध यात्रा पूरी की |

    स्वतंत्रता के समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ( इस पूरे पदबंध का प्रयोग साभिप्राय है | ) के अध्यक्ष और पंडित नेहरु के निकट सहयोगी रहे जे. बी. कृपलानी जो १९७६ में लगभग नब्बे साल के थे आपातकाल के कट्टर विरोधी थे | उन्होंने उस समय शिकायत की कि इस समय जब उनके सभी साथी जेल का सुख भोग रहे है उन्हें बाहर क्यों छोड़ दिया गया है | इसके बाद उन्होंने व्यंगपूर्ण टिप्पड़ी की कि ‘ एक घर तो ड़ायन भी छोड़ देती है | देवी दुर्गा से ड़ायन बनने का , श्रीमती गांधी का यह सफ़र बहुत तीव्र और रोचक था | २ अक्टूबर १९७५ को गांधी जी के जन्मदिवस पर आचार्य कृपलानी ने गांधी जी की समाधि पर एक प्रार्थना सभा का आयोजन किया , जिसमे कई लोगों ने भाषण दिया | पुलिस ने कई लोगो को गिरिफ्तार किया पर आचार्य को गिरिफ्तार नही किया गया |( लाल कृष्ण अडवाणी की आत्मकथा मेरा जीवन मेरा देश में दी गयी सूचना के अनुसार आचार्य कृपलानी को डी. आई . आर . – डिफेन्स आफ इंडिया रुल – के तहत गांधी जी के पौत्र राजमोहन गांधी और समाजवादी नेता एच . वी. कामथ के साथ गिरिफ्तार किया गया था , पर प्रतिष्ठित इतिहासकार रामचंद्र गुहा लिखते है कि पुलिस ने कृपलानी को छोड़ दिया था | ) शायद ऐसी घटनाओं को देख कर ही उस समय प्रसिद्द कवि बाबा नागार्जुन ने लिखा था -

        इन्दु जी , इन्दु जी क्या हुआ आपको !
        सत्ता के मोह में भूल गयी बाप को |

      लेखमाला की इस कड़ी के अधिकाँश तथ्य रामचंद्र गुहा की पुस्तक भारत: नेहरु के बाद से लिए गए है | )

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