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आपातकाल - ७ : ड्यूक आँफ डेलही

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कभी श्रीमती गांधी ने पूर्व राजा-महराजाओ को जन्म की बजाय कर्म की बदौलत प्रतिष्ठा पाने की नसीहत दी थी | लेकिन अब अपनी उसी नसीहत के सामने उन्होंने घुटने टेक दिए थे |उनके बेटे की तरक्की उसी सामंतवादी और वंशवादी रास्ते से हुई थी | जिस तरह एक युवराज को किसी ख़ास जगह के ड्यूक ( ड्यूक आफ …… ) या किसी ख़ास जगह के प्रिंस ( प्रिंस आफ ……) की पदवी दी जाती है उसी तरह संजय गांधी को कांग्रेस की युवा शाखा का प्रभारी बना दिया गया ( यधपि व्यवहारिक रूप में युवा कांग्रेस का अध्यक्ष भी इस प्रभारी से आदेश लेता था | ) , जिस तरह मुग़ल शहजादों को सत्ता संभालने से पहले किसी सूबे का सूबेदार बना दिया जाता था उसी तरह संजय गांधी को भारत की राजधानी का प्रभार सौंप दिया गया | आपातकाल लगने के कुछ ही दिनों के भीतर यह बात पूरी तरह प्रचारित हो गयी कि प्रधानमन्त्री खुद ही चाहती हैं कि दिल्ली का मामला उनका बेटा ही देखे |

    -राम चन्द्र गुहा

    भारतीय राजनीतिक पटल पर संजय गांधी की उपस्थिति कोई आकस्मिक घटना नही थी | इसकी शुरुवात तो आजादी से पहले 1930-31 में तब ही हो गयी थी जब पंडित मोतीलाल नेहरु ने कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षता अपने पुत्र जवाहरलाल नेहरु को हस्तांतरित की थी | बाद में १९५८ में प. नेहरु ने इस गुरुतर उत्तरदायित्व को अपनी दुहिता इंदिरा ‘ प्रियदर्शिनी’ को सौप दिया | संजय गांधी के अभ्युदय के विषय में बिशन टंडन लिखते है – ” राजनीति और प्रशाशन में संजय का प्रादुर्भाव उसकी मारुती योजना से हुआ | संजय को अपनी नयी कार का माडल बनाने में सरकार के विभिन्न विभागों के सहयोग की आवश्यकता थी | इस कार्य में उसकी माँ ने किस तरह उसे अपनी सत्ता और प्रभाव का दुरूपयोग करने दिया इसका कच्चा-चिठ्ठा गुप्त ( मारुती ) आयोग की रिपोर्ट में दिया गया है , जिसे यहाँ दोहराने की आवश्यकता नहीं है | संजय ने विधिमंत्री गोखले के अधिकारियों से स्पष्ट कहा था की ‘ मेरे ऊपर कोई कानून लागू नही होता | ‘ उसका स्वभाव था कि वह जो चाहे , उसे फौरन , बिना सवाल-जवाब किये , फौरन पूरा किया जाना चाहिये | उसकी सहायता के लिए इंदिरा गांधी ने अनौपचारिक रूप से अपने एक निजी अतिरिक्त सहायक को लगा दिया था और संजय के आदेश , उसकी इच्छाए बहुधा उसी के माध्यम से विभिन्न मंत्रालयों , विभागों और अधिकारियों को दी जाती थी |

    संजय की योजना की सहायता के लिए पहले उससे सम्बंधित विभागों में जैसे दिल्ली प्रशाशन , केंद्र के राजस्व विभाग , उधोग व् वाणिज्य विभाग आदि में ‘ आज्ञाकारी अधिकारियों ‘ की नियुक्ति की जाने लगी | कुछ ही समय में यह प्रक्रिया पूरे शाशन पर छा गयी | सभी महत्वपूर्ण सरकारी विभाग और उपक्रम इसकी लपेट में आ गए | इन सब जगहों पर चुने हुए ‘लचीले ‘ अधिकारी नियुक्त किये जाने लगे | धीरे-धीरे महत्वपूर्ण पदों पर जिन अधिकारयो की नियुक्ति की जाती थी पहले संजय और अतिरिक्त निजी सचिव उनका इंटरव्यू करते थे ………………….फिर प्रधानमंत्री स्वयं केन्द्रीय मंत्रियो , मुख्यमंत्रियों , राजनेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों को अपने पुत्र के पास भेजने लगी | यह दुर्भाग्यपूर्ण है की कई महारथी राजनेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों ने इस नवीन प्रथा को प्रतिष्ठित करने में अपना योगदान दिया | परिणाम यह हुआ कि हर दिन प्रधानमंत्री आवास में प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में दरबार लगता जिसमे कई वरिष्ठ अधिकारी इस असंवैधानिक सत्ता केंद्र को अपनी कारगुजारियों की रिपोर्ट देने और आदेश लेने के लिए उपस्थित रहते |……………….इससे भी गलत यह हुआ कि जो अधिकारी इस नए सत्ता केंद्र की बात नहीं सुनता था उसे सी.बी.आई. ,पुलिस , कर विभाग आदि के द्वारा परेशान किया जाता था | ”

      जैसा कि टंडन जी के वृत्तांत से स्पष्ट हो जाता है कि संजय गांधी को प्रारम्भ में एक उधोगपति के रूप में स्थापित करने के प्रयास किये गए इस प्रक्रिया में उनकी महत्वाकांक्षी ऑटोमोबाइल परियोजना तो साकार ना हो सकी पर संजय एक बिगडैल राजकुमार के रूप में जरुर उभर पड़े | संजय अपनी कार का माडल तक नही बना पा रहे थे | बाहर से इंजन स्मगल कर के जांच -पड़ताल करवा दी गयी लाईसेन्स भी प्राप्त कर लिया गया पर उससे आगे कुछ होता नजर नही आ रहा था | टंडन के अनुसार उन दिनों प्रधानमन्त्री वरिष्ठ मंत्रियो के साथ अनेकों0 बैठके कर मारुती समस्या पर विचार करती रहती थी | कार बनाने के लिए ना तो पर्याप्त धन था और ना ही साधन | जिन लोगों ने एजेंसी पाने के लिए लगभग ढाई करोंड रुपये दे रखे थे उनके अदालत जाने का खतरा भी उपस्थित था | ऊपर से संजय का व्यवहार भी ठीक नहीं था वे अपनी माँ तक से अशिष्टता से बात करते थे और समस्या के हल में कोई रुचि नही दिखा रहे थे | टंडन तत्कालीन विधिमंत्री गोखले को उद्धृत करते हुए लिखते है कि उन्होंने उनसे कहा कि ‘ मारुती का रुपया एक और कम्पनी मारुती कंसल्टेंसी द्वारा चूसा जा रहा है ……….. सब कुछ मिलाकर एक बड़ा गोरखधंधा खडा हो गया है | पता नही क्या होगा | ‘
      दरसल इस गोरखधंधे में संजय एक अतरिक्त सत्ताकेंद्र के रूप में उभर चुके थे और धीरे धीरे वे एक छाया प्रधानमन्त्री के रूप में सामने आ रहे थे | यह भारतीय लोकतंत्र और राजनीति का एक नया प्रतिमान था जो हाल-फिलहाल ही उभर रहा था | सच कहे तो वे शायद भारत में राजनीतिक लंठई और लम्पटता के अग्रपुरुष थे | संघीय मंत्रिमंडल और अधिकार तंत्र अब संजय गांधी और उनकी कोर टीम के इशारों पर चलने लगा जिन्हें स्व. बिशन टंडन ने ”महल के सिपहसालार ” कह कर संबोधित किया है | इन सिपहसालारो में प्रमुख नाम वी. सी. शुक्ला , बंसीलाल , संजय सिंह ( अमेठी ) , अम्बिका सोनी , रुखसाना सुलतान ( अभिनेत्री अमृता सिंह की माँ ) , आर. के. धवन ( प्रधानमंत्री के टंकड़ लिपिक ) , धीरेन्द्र ब्रहमचारी ( एक योग गुरु जिनका एक बन्दूक का कारखाना भी था ) जगमोहन ( डी.डी.ए. के तत्कालीन उपाध्यक्ष बाद में अटल सरकार में संघीय मंत्री बने ) नवीन चावला ( दिल्ली के उपराज्यपाल के सचिव जो यू.पी.ए. सरकार में चुनाव आयक्त बने ) और आई. पी. एस. अधिकारी पी . एस. भिंडर आदि थे | ऐसा कहा जाता था की अगर कोई सरकारी काम करवाना हो तो इस समूह के किसी सदस्य को बात कर ले जिन व्यापारियों को कोई लाइसेंस लेना होता या टैक्स माफ़ करवाना होता या फिर मंत्री बदलवाने होते तो वह इसी चौकड़ी से संपर्क करता था इंदिरा गांधी को आपातकाल की सलाह देने वालो में संजय गांधी का सर्वप्रमुख योगदान था | आपातकाल लगने के बाद तो संजय की शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हो गयी प्रधानमंत्री उनकी सलाह पर मंत्रियो की अदला- बदली करने लगी जब इन्द्र कुमार गुजराल प्रेस के प्रति अत्यधिक उदारता दिखाने लगे तो संजय की सलाह पर उन्हें हटा कर विधाचरण शुक्ल जैसे नेता को सूचना प्रसारण मंत्री बना दिया गया इसी तरह नेहरु के सहयोगी रह चुके अनुभवी नेता सरदार स्वर्ण सिंह को हटा कर संजय गांधी के करीबी बंसीलाल को रक्षा मंत्री बना दिया गया परिणाम यह हुआ कि भरतपुर , राजस्थान की एक सभा में जब संजय भाषण देने पहुचे तो उंचाई पर बने मंच पर चढ़ने के लिए उन्होंने राजस्थान के कांग्रेसी मुख्यमंत्री श्री हरिदेव जोशी के श्रीस्कंधो का प्रयोग किया जबकि उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी ने उनकी चप्पल उतारने का सौभाग्य प्राप्त किया |( अमर उजाला और नवभारत टाएम्स के पत्रकार रहे श्री हर्षदेव के एक संस्मरण से उद्धृत )

      आपातकाल के दौरान इंदिरा जी के २० सूत्रीय कार्यक्रम से अलग संजय गांधी द्वारा अपने ५ सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की गयी | इन ५ सूत्रों में से दो – नसबंदी ( परिवार नियोजन ) और सौन्दर्यीकरण ने विशेष प्रसिद्धि पायी | दिल्ली के सौन्दर्यीकरण पर विशेष जोर डाला गया और इसका बीडा उठाया जगमोहन ने | आपातकाल के पहले दिल्ली में डीडीए कुल ६०००० हजार झोपड़ी ही हटा पायी थी पर आपातकाल के दौरान यह संख्या दोगुने से भी जादा हो गयी | इस प्रक्रिया में तुर्कमान गेट काण्ड की घटना ने विशेष प्रसिद्धि पायी | १३ अप्रैल १९७६ की सुबह एक बुलडोजर पुरानी दिल्ली के इस इलाके में प्रकट हुआ | पहले तो इसने हाल में ही बसी झोपड़ पट्टियो का विध्वंस किया और बाद में पक्के मकानों की और मुड़ गया | इससे पुलिस और जनता में झड़प हुई जो बाद में दंगो में बदल गयी | एक अनुमान के मुताबिक़ इसमें मरने वालो की संख्या १० से २०० के बीच थी | पुराने शहर में कफ्र्यू लगा दिया गया जो करीब एक महीने बाद ही उठाया जा सका | इसी तरह परिवार नियोजान जैसे सही कार्यक्रम को भी सिर्फ संजय को खुश करने के लिए अतार्किक ढंग से चलाया जा रहा था | कर्मचारियों को अपना एरियर और इन्क्रीमेंट लेने के लिए नसबंदी करानी पड़ती थी , ट्रक ड्राईवरो को लाईसेन्स के नवीनीकरण के लिए नसबंदी करानी पड़ती | पूरे देश में जबरदस्ती आपरेशन की होड़ लग गयी | जो अधिकारी जादा आपरेशन करवा देता उसे पदोन्नति मिलती वरना तबादला कर दिया जाता | जब स्वास्थ्य कर्मचारी गांव में जाते तो भय के कारण गांव खाली हो जाते | कितने ही अविवाहित लोगो की नसबंदी कर दी गयी थी | सुल्तानपुर , कानपुर . बरेली और मुज फ्फरपुर में पुलिस और जनता के बीच हिंसक झड़प हुई | इसमें मुजफ्फरपुर की घटना अधिक कुख्यात हुई जिसमे लगभग ५० लोग मारे गए थे | इस सन्दर्भ में राही मासूम रजा के उपन्यास कटरा बी आरजू का उल्लेख रोचक होगा जो आपातकाल की पृष्ठभूमि पर ही आधारित है | उपन्यास का एक पात्र मास्टर बदरुल हसन पक्का कांग्रेसी है ,उसने ” इस्लाम में नसबंदी ” शीर्षक की एक नज्म भी लिखी है | बदर मास्टर का निकाह शहनाज से तय है | निकाह से पहले वह एक बरात के सिलसिले में पानीपत जाता है और रास्ते में ही पुलिस दुल्हे सहित सभी बारातियों की जबरिया नसबंदी कर देती है और भुक्तभोगियो को तीस-तीस रुपये दे कर चलता कर देती है | बदर जब इलाहाबाद स्थित अपने मोहल्ले कटरा वापस आता है तो शहनाज से निकाह को इनकार कर देता है | जब शहनाज उससे पूछती है की वह ऐसा क्यों कर रहा है तो बदर जवाब देता है -
      “संजय का हुक्म नहीं है | बंसीलाल ने मना किया है | ”
      क्या ?
      हां , और जब वे दोनों मुझे हुक्म दे रहे थे कि मैं शादी ना करूं तो मिसेज गांधी ने उन्हें मना भी नहीं किया | उनसे कहा भी नहीं कि इसे शादी से ना रोको , यह शहनाज से प्यार करता है …………
      सब कुछ जान लेने पर शहनाज बदर से शादी का निश्चय करती है , उसे अकेला नही छोड़ती और मेहर में वही तीस रूपए लेती है जो बदर को जबरिया नसबंदी के बाद मिले थे | कथाक्रम में नाटकीय परिवर्तन तब आता है जब आपातकाल के बाद लोकसभा चुनाव की घोषणा होती है और कांग्रेसी उम्मीदवार आशाराम चुनावी चन्दा माँगने कटरा आता है | शहनाज , आशाराम को चंदे के रूप में वही तीस रूपए लौटा देती है | आशाराम को रूपए देती हुई वह कहती है – “यही तीस रूपए मेरी कुल जमा-पूँजी है | ” आशाराम वे रूपए चंदे में ले लेता है पर बदरुल हसन के अलावा कोई नही समझ पाता कि आशाराम ने क्या लिया है |
      उसी रात बदरुल हसन और शहनाज ज़माने की जानकारी में निकाह कर लेते है |……………( क्रमशः )

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