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भारतीय पतन का प्रस्थान-बिंदु

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मिनिर्वा में उल्लू तभी उड़ते है जब रात गहरा जाती है ,- यह वाक्य प्रख्यात दार्शनिक हीगल ने फ़्रांसीसी क्रान्ति के विषय में कहा था जब उसने देखा कि क्रान्ति की आड़ में कुछ लोगो ने आमूलपरिवर्तनवादी विचार रखने प्रारम्भ कर दिए है जो खतरनाक हो सकते हैं | निश्चित रूप से भारत में भी रात गहरा रही है और पिछले कुछ दिनों से भारतीय आकाश में भी ऐसे ही उल्लू उड़ते हुए दिखायी दे रहे हैं | धातव्य है की पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की बात तो जोर-शोर से की जा रही है पर सामाजिक सुधार की अनदेखी की जा रही है | निश्चित रूप से राजनीतिक सुधार तात्कालिक आवश्यकता हैं और बहुत जरुरी भी पर सामाजिक कमियों की अनदेखी से समस्या का सही निदान नहीं हो सकेगा | क्योकि गांधी मूर्ख नही थे जब वे अंगेजी सत्ता से संघर्ष के साथ -साथ घर की सफाई और चरखे की बात करते थे और ना ही जे. पी. जिन्होंने क्रान्ति के आगे सम्पूर्ण शब्द का प्रयोग किया था |

    आखिर क्यों हमारा जनतंत्र अरस्तू द्वारा वर्णित भीड़तंत्र में परिवर्तित होता जा रहा है | यदि ध्यान से देखे तो भारतीय राजनीति की इस दुर्दशा के लिए भारतीय समाज भी कम उत्तरदायी नही है | हमारा राजनीतिक परिसर हमारे सामाजिक परिसर से अलग नही हो सकता | आदर्श स्थिति में समाज को यह निर्देशित करना चाहिये कि राजनीति क्या करे ? पर यहाँ तो राजनीति समाज को निर्देशित करती दिख रही है और वह भी सत्ता की पूरी धमक और अहंकार के साथ | कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि भारतीय समाज अपनी निर्देशन क्षमता पूरी तरह खो चुका है | याद करे , आज के पचीस-तीस वर्ष पूर्व हमारे गावो में यदि ह्त्या या जारकर्म जैसे अपराध करता था तो उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता था पर आज की स्थति इसकी ठीक उलटी है | सत्ता के चरण चुम्बन की प्रवृत्ति सर्वत्र व्याप्त दिखायी देती है सफलता किसी भी कीमत पर हमारा मूल-मंत्र बन चुका है | साध्य और साधन का सिद्धांत गांधी के अपने देश में कूड़े-दान की वस्तु बन चुका है | ऐसे लोग जिन्हें कभी समाज बहिष्कृत कर के गाँव के बाहर रहने को बाध्य कर दिया करता था वही लोग आज देश की विधायिकाओ में बैठने के लिए प्रयासरत दिखायी देते हैं | सच तो यह है कि उनमे यह हिम्मत ही पैदा नही होनी चाहिये थी और यदि वे इस प्रकार के ( दुः)स्वप्न देख रहे है तो समाज अपना पल्ला झाड कर अलग नही खडा हो सकता |

भारतीय समाज के इस पराभव से भारतीय राजनीति में आयी इस क्षरणशीलता के निष्कर्ष पर पहुंचते ही दूसरा प्रश्न उठ खडा होता है कि इस पराभव का मूलकारण क्या है ? यदि ध्यानपूर्वक देखा जाय तो हमारे समाज में दिख रही यह कमजोरी आजादी के बाद कुछ जादा ही बलवती हुई | हम यह तो नही कह सकते कि इसके पूर्व हमारा समाज अपने आदर्श स्वरूप में था क्योकि यदि ऐसा होता तो हमें पराधीनता का इतना लंबा काल ना देखना पड़ता परन्तु यह अवश्य कहा जा सकता है कि इसके पूर्व हमारा समाज अपने प्रभुवर्ग की अपेक्षा मूल्यों के प्रति अधिक सचेत था तथापि वह अपने शाशको को अधिक प्रभावित नही कर पाता था किन्तु राष्ट्रीय आन्दोलन की पृष्ठभूमि में जनता पर्याप्त रूप से सचेत हुई और स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र को स्वीकार करने के कारण वह राज्य को प्रभावित करने की स्थिति में भी आ गयी |

दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के बाद मिले इस सुअवसर का लाभ उठाने में हम असफल रहे , लोक को जिस सीमा तक तंत्र को प्रभावित या निर्देशित करना चाहिये था , वह नही कर पाया और हम एक सच्चे लोकतान्त्रिक प्रतिमान के निर्माण में असफल रहे | हम लोकतंत्र में निहित लोक और तंत्र के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध को समझ पाने में असफल रहे |

भारतीय मानस इस पतनशील दशा में क्यों पहुच गया , लोक और तंत्र का समन्वय क्यों नही हो सका , यह प्रश्न विशेष रूप से विचारणीय है | राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्ता के शब्दों में – ” हम कौन थे , क्या हो गए और क्या होगे अभी? ” यह प्रश्न आत्महीनता का नही अपितु आत्मविश्लेषण का है और समकालीन दशाओं में अनिवार्य रूप से विचारणीय है जिससे चाह कर भी नही बचा जा सकता |

कहा जाता है कि “इतिहास अपनी तात्कालिकता में हमेशा शाश्वत होता है” के. एम्. मुंशी ने पंडित नेहरु को लिखे एक पत्र में लिखा था – ” भविष्य को ध्यान में रख कर वर्तमान में कार्य करने की शक्ति मुझे अतीत के प्रति अपने विश्वास से ही मिली है | “संकट की घड़ी में कई बार हमें इतिहास से शक्ति और समाधान दोनों प्राप्त होते है | तो तात्कालिक प्रश्न को ध्यान में रख कर जब हम इतिहास की वीथिका में झांकते है तो हमें पता चलता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को इस संकट का पूर्वाभास बहुत पहले ही हो गया था , बापू लिखते है-

” भारत के सामने इस समय अपनी आत्मा को खो देने का ख़तरा है और यह संभव नही है की अपनी आत्मा को खो कर वह जीवित रह सके | इसमे अपना शुद्ध और चैतन्य स्वरूप प्रकट करने की क्षमता अभी भी है | भारत ने आत्मशुद्धि के लिए स्वेछापूर्वक पूर्वक जैसा प्रयास किया है उसका दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण नही मिलता …………………….केवल भारत ही कर्मभूमि है अन्य सभी भोगभूमि है | भारत यूरोप , जापान या चीन नही है | इसकी नियति विशिष्ट है | आलसी की तरह लाचारी प्रकट करते हुए उसे यह नही कहना चाहिये की पश्चिम की बाढ़ से मै बच नही सकता | अपनी और दुनिया की भलाई के लिए उसे इस बाढ़ को रोकने योग्य शक्तिशाली बनना ही होगा | यह तपश्चर्या की अमरभूमि है , इसे अपनी नियति को स्वीकार करना ही होगा | “

बापू का यह कथन और उनके इस प्रकार के विचार परम्परा और आधुनिकता में किसी प्रकार का कोई द्वन्द उपस्थित नही करते जैसा की बहुत से लोग समझते है , हो सकता है कि आप उनके प्रयोगों से या उनकी कार्यनीति से असहमत हो पर उनके इस विचार की मूलभावना से सहमत ना होना कठिन है विशेष रूप से भारतीय संदर्भो में | गांधी भरसक रूप से भारतीयों को पश्चिमी सभ्यता के उस सर्वग्रासी प्रभाव से बचाना चाहते थे जो लालच और शोषण पर आधारित थी और जिसे वह शैतानी सभ्यता कह कर पुकारते थे |

    गांधी से पूर्व स्वामी विवेकानंद ने भी इस संकट को भिन्न स्वरूप में पहचाना था | सेनापति की तरह उन्होंने अपने जनो को एकजुट हो कर उठ खड़े होने के लिए पुकारा -
    ” प्रत्येक राष्ट्र का, व्यक्ति की भाँति जीवन का एक मूल लक्ष्य होता है | एक केंद्र होता है , वादी स्वर बनता है जिसका अवलंबन कर अन्य स्वर संगीत में संगति पैदा करते है | जो राष्ट्र अपनी राष्ट्रीय प्राणशक्ति को छोड़ना चाहता है , सदियों से प्रवाहित अपनी दिशा को बदलना चाहता है , वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है |किसी राष्ट्र की प्राण शक्ति राजनीतिक शक्ति है जैसे इंग्लेंड की , किसी की कलात्मक जीवन तो किसी की कुछ और | भारत का केंद्र है- आध्यात्मिक जीवन , राष्ट्रीय जीवन संगीत का वही आदिस्वर है ……………..इसलिए यदि तुम धर्म और आध्यात्म का मार्ग त्याग कर राजनीति और समाज का मार्ग पकड़ोगे …………तब तुम लुप्त हो जाओगे ………..समाज और राजनीति की शिक्षा तुम्हे आध्यात्म और धर्म के माध्यम से देनी होगी | “

भारतीय समाज के वर्तमान पतन का प्रस्थान-बिंदु यही छिपा है | स्वतंत्रता के बाद अपनाई गयी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में हमने कहीं भी , सच्चाई के साथ इस भाव को सहेजने का प्रयास नही किया | भारत की आत्मा को समझे बिना ही हमने पश्चिमीकरण को ही आधुनिकीकरण का पर्याय मान लिया | पश्चिमी संस्थाओं और व्यवस्थाओं को , जो वहा की मौलिक परिस्थतियो की उपज थी , हमने बलपूर्वक भारत की देशी और जातीय परिस्थितियों में घुसेड़ने का प्रयास किया | भारत के मूलभाव को सहेजने वाला कोई समकालीन प्रतिमान स्थापित करने का प्रयास ही नही किया गया | ( एकमात्र आधे अधूरे पंचायती राज को छोड़ कर ) आध्यात्मिकता और धार्मिकता को तो संस्थानिक स्तर पर मानो नकारात्मक शब्द ही मान लिया गया | वास्तव में ये भारत की आत्मा को नकारने का प्रयास था |

हमारा प्रारम्भिक नेतृत्व इस बात को समझने में पूर्णतया असफल रहा कि हम एक ऐसी व्यवस्था को अपनाने का प्रयास कर रहे है जो हमारी जीवन शैली के पूर्णतया विपरीत है | हमारी जीवन शैली सामूहिकता को प्रश्रय देती है जबकि पश्चिमी जीवनशैली वयेक्तिक्ता को अपनाती है | हम , हमारे बिम्ब , हमारे प्रतीक सब कुछ पश्चिम से पूर्णतया अलग रहे है | यहाँ मै स्व. निर्मल वर्मा की इन पंक्तियों को उद्धृत करना चाहूगा -

” संस्कृति का भारतीय स्वरूप पश्चिम की सांस्कृतिक धारा से पूर्णतया अलग है | योरोपीय संस्कृति का आभिर्भाव ही व्यक्ति की विकसित आत्मचेतना से हो पाया है | इस आधार पर अकेले व्यक्ति ने यथार्थ का एक निजी स्वायत्त दर्शन सृजित किया है | एक ऐसा दर्शन जिसकी जड़े उसके व्यक्तिगत अनुभव में निहित है | दुसरे शब्दों में पश्चिमी संस्कृति का प्रादुर्भाव एक ऐसी खंडित चेतना में हुआ है जहा मनुष्य स्वयं को प्रकृति , विश्व और दूसरे मनुष्य से बिलकुल अलग पाता है और उसे अनुभव होता है कि इस अलगाव को महज धार्मिक आस्था और परम्परा द्वारा नही पाटा जा सकता | वह महसूस करता है की धर्म और परम्परा उसे सान्त्वना और सहारा तो दे सकते है किन्तु उसके अन्दरुनी मर्म की गहरी परतो में पैठ नही सकते , जहां वह सम्पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है और अपनी स्वतंत्रता में पूर्ण रूप से अकेला है | “

इस लिए धर्म पश्चिमी मानव के लिए व्यक्तित्व की पूर्णता को प्राप्त करने का एक यन्त्र मात्र है , धर्म उसके सम्पूर्ण व्यक्तिव को पारिभाषित नही करता | धर्म ही नही यदि परिवार और राज्य भी उसके व्यक्तित्व की तथाकथित स्वतंत्रता के आड़े आता है तो वह उन्हें भी तिलांजलि देने में संकोच नही करेगा |वास्तव में पश्चिम का मानव एक भौतिक मानव है आध्यात्मिक मानव नही , वह स्वयं को ब्रह्माण्ड की एक पृथक और स्वायत्त इकाई मानता है जिसकी तुलना अन्य किसी से नही की जा सकती | पृथक अस्तित्व का यह भाव चरम पर जा कर स्वयं को प्रकृति से भी पृथक समझने लगता है | इस तरह वह भोगवादी बन जाता है और प्रकृति से सामंजस्य बिठाने की बजाय उसके दोहन में विशवास करने लगता है |

किन्तु भारतीय दृष्टि इस प्रकार का कोई विभेद स्वीकार नही करती |यहाँ व्यक्ति के भौतिक और आध्यात्मिक अनुभवों में कोई विभेदक रेखा नही खीची गयी है |हमारे धार्मिक अनुष्ठान सामाजिक जीवन के साथ गहराई से जुड़े है | भारतीय जीवन दृष्टि भोग को स्वीकार करती है पर शोषण की हद तक ले जाए बिना और संतुलित मात्रा में | वह भोग को भी त्यागपूर्वक करने का उपदेश देती है और उसकी प्राप्ति के लिए एक व्यवहारिक आचारसंहिता – त्याग ( ब्रह्मचर्य) , संतुलित भोग ( गृहस्थ ) , त्यागपूर्वक भोग ( वानप्रस्थ ) और त्याग ( संन्यास ) – भी प्रस्तुत करती है |

स्वतंत्रता के बाद अपनायी गयी व्यवस्था में हमने उपरोक्त भारतीय आदर्शो की पूर्णतया अवहेलना कर दी | इससे हमारे जीवन दर्शन और राजनीतिक दर्शन में विभेद पैदा हो गया | वह आध्यात्मिकता जो हमारे समाज को दुष्प्रवृत्तियो से बचाती थी और नियंत्रण क्षमता प्रदान करती थी एक बाहरी वस्तु मान ली गयी और हमारा समाज धीरे-धीरे अपनी नियंत्रत्रण की शक्ति खोने लगा |

    यहाँ सवाल दो संस्कृतियों की तुलना कर के एक बड़ा सिद्ध करने का नही है सवाल है दो भिन्न जीवन दृष्टियों की तुलना करते हुए अपने मूल को ना छोड़ने का और जैसा की स्वामी विवेकानंद ने कहा था- ” स्वतंत्रता आध्यात्मिक प्रगति की एकमात्र शर्त है और यूरोप ने उसे अध्यात्मिक क्षेत्र में उसे भारत से अधिक प्रभावी ढंग से जाना है किन्तु अध्यात्मिक क्षेत्र में उसने उसे अत्यंत कम ही कल्पित किया है | “भारत स्वतंत्रता को अध्यात्मिक क्षेत्र में कल्पित करता है और उसे सामाजिक जीवन में इस प्रकार पिरोता है की वह सामाजिक सम्पूर्णता की प्रतीक बन जाती है | दुःख की बात है की आज हम अपनी उस विरासत को छोड़ देने को उद्धत है जिसे संसार को हमारी देन कहा जा सकता है और यह बिछोह ही हमारे सामाजिक विखंडन का कारण भी बन रहा है | आज जरुरत उस प्राचीन परम्परा को फिर से संरक्षित करने की है जिसे हमने सदियों के अनुसंधान के बाद प्राप्त किया था |

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