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संस्कृति प्रतिसंस्कृति और अपसंस्कृति

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संस्कृति स्वयं में एक निरंतर और बहुआयामी संकल्पना है | एक ऐसी संकल्पना जो जीवन के समस्त पक्षों को स्वयं में समेट लेती है | किसी भी राष्ट्र और समाज की पहचान उसकी अपनी संस्कृति से होती है | वास्तव में जब हम राजनीतिक दृष्टिकोण से बहुराष्ट्रीयता की बात करते है तो वस्तुतः हम बहुसांस्कृतिकता की बात कर रहे होते है | ये बहुसंस्कृतिया एक दूसरे के लिए प्रतिसंस्कृतियो का काम करती है जिससे अंतत एक नवीन , अधिक उच्चतर, समग्र और विशिष्ट संस्कृति का निर्माण होता है जो सभी को स्वीकार्य होती है और उनकी वास्तविक पहचान भी |
संस्कृतियों का यह द्वन्द वास्तव में कोई संघर्ष नही है अपितु एक दूसरे को समझने , आत्मसात करने और विशुद्धीकरण की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है | यह प्रक्रिया कुछ – कुछ जर्मन दार्शनिक हीगल के द्वंदवाद के समीप है जहा वाद और प्रतिवाद के परस्पर संलयन से संवाद का जन्म होता है जो अधिक उच्चतर और सत्य के अधिक समीप होता है | परन्तु यह सांस्कृतिक संवाद कभी भी परम या पूर्ण नहीं होता , यह तो एक निरंतर गतिशील प्रक्रिया है जिसका कभी कोई अंत नहीं होता | मानव प्रज्ञा के निरंतर अनुभव इसमें जुड़ते ही चले जाते है | जब तक इस धरा पर मानव का अस्तित्व है संस्कृतियों का और उनके संलयन का अस्तित्व भी बना रहेगा और संस्कृति के लुप्त होने पर पशु से विलग मानव अस्तित्व पर भी सवालिया निशान लग जाएगा |
यदि हम इतिहास पर दृष्टि डाले तो हजारो वर्ष पूर्व द्रविणों या अनार्यो के विरुद्ध आर्य संस्कृति भी एक प्रतिसंस्कृति की भांति आई थी जिनके द्वंद से एक नवीन संस्कृति का जन्म हुआ जिसमे आर्य और द्रविण दोनों ही प्रतीक शामिल थे | आर्यों में लिंगपूजन और तांत्रिक अनुष्ठानो का प्रयोग द्रविण संस्कृति का ही प्रभाव था | ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध बौद्ध धर्म का प्रारम्भ भी इसी सांसकृतिक द्वन्द का परिणाम था जिसने ब्राहमण धर्म को एक नया रूप धारण करने को विवश किया जो जनाकांक्षाओ और आवश्यकताओं को ज्यादा बेहतर ढंग से सहेजता था | वैश्यों की सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि बौद्ध धर्म के ही प्रभाव से हुई | यदि बौद्ध व जैन धर्म द्वारा पालि और प्राकृत भाषा को ना अपनाया जाता तो क्या आगे चल कर तुलसी देश भाषा में राम कथा की रचना कर पाते – यह एक विचारणीय प्रश्न है |
सांस्कृतिक मिलन की यह प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से चलती रहती है पर यदि इसे बलात बाधित किया जाय या एकांगी रूप देने का प्रयास किया जाय तो इस कृत्य के परिणाम विध्वंसकारी होते है | मध्यकालीन भारत में कुछ ऐसा ही दृश्य दिखाई दिया | प्रारंभ में जब इस्लाम ने भारत में कदम रखे थे तो एक रोचक दृश्य उत्पन्न हुआ | यह संसार की प्राचीनतम और नवीनतम संस्कृतियों का एक दूसरे से प्रथम मिलन था जिन्हें आगे चल कर एक दूसरे के साथ – साथ रहना था | एक बार पुनः संलयन की प्रक्रिया का प्रारंभ हुआ सूफी मत का आगमन( जिसका मूल तो मध्य एशिया था पर भारत में इसका एक नवीन संस्करण दिखाई दिया ) , गुलात , अली इलाही , मोतजली सम्प्रदायों का उदय (जो अद्वैतवाद से प्रभावित रहे और कुरआन को निभ्रान्त ईश्वर वाक्य नहीं मानते थे ) आदि चीजे इसी और संकेत करती है | अकबर की सुलह कुल नीति और दीन – ऐ – इलाही धर्म इसी प्रक्रिया का स्वाभाविक परिणाम थी | दुर्भाग्यवश यह प्रक्रिया आगे चल कर बाधित कर दी गयी | दारा शिकोह और औरंगजेब का सत्ता संघर्ष इसी बाधित किये जाने की प्रक्रिया का प्रतीक कहा जा सकता है | दारा जहां सांस्कृतिक संलयन का प्रतीक था औरंगजेब रुढिवादिता और कट्टरपन का और दुर्भाग्यवश रुढ़िवाद की ही विजय हुई | संलयन की प्रक्रिया बलात बाधित की गयी, इससे एक अपसंस्कृति का उदय हुआ जिसका चरमोत्कर्ष हम भारत विभाजन के रूप में देखते है | यह अकस्मात् नहीं है कि शेख सरहिन्दी जो एक शुद्धतावादी धार्मिक नेता था का नाती औरंगजेब का आध्यात्मिक मार्गदर्शक था और पाकिस्तान के दार्शनिक प्रणेता मोहम्मद इकबाल का गुरु भी सरहिन्दी की ही परम्परा का था |
भारत में अंग्रेजो के प्रवेश को परम्परा और आस्था के आधुनिकता और वैज्ञानिकता से मेल के रूप में देखा जा सकता है | भारत में अंग्रेजी राज की प्रमुख विशेषता थी कि इस जाती ने हमेशा अपने पित्र देश के हितों को वरीयता दी और भारत की सांस्कृतिक प्रक्रिया से लगभग कटे रहे | किसी अंग्रेज वायसराय द्वारा किसी भारतीय त्यौहार को सार्वजनिक रूप से मनाने का उदाहरण संभवतः अपवाद स्वरूप ही मिल पाए जबकि पूर्व के अधिकांश शाशको में यह बात अपवाद नही थी | भारतीय अंग्रेजो की निगाह में हमेशा काले , असभ्य , गुलाम ही रहे जो बात करने के योग्य भी नही थे | विलियम जोन्स और एनी बेसेंट जैसे कुछ नाम अवश्य गिनाए जा सकते है पर अधिकांश अंग्रेजो की भारतीयों के बारे में राय अपने प्रधानमंत्री जैसी ही थी जो महान गांधी को भी अधनंगा फकीर कहता था | सत्य तो यह है कि एक सामान्य भारतीय आंग्ल संस्कृति से जितना कुछ सीख पाया , एक सामान्य अंग्रेज भारतीय संस्कृति से उतना कुछ ग्रहण नही कर सका | यदि उसने भारत से कुछ ग्रहण भी किया तो नितांत व्यैक्तिक स्तर पर और बौद्धिक उत्कृष्टता के लिए | भारतीयों में अंग्रेजी संस्कृति का जो प्रभाव सामाजिक स्तर पर देखने को मिलता है अंग्रेजो में वह प्रभाव वयैक्तिक स्तर पर ही रहा|

अंग्रेजो और भारतीयों में हुए इस एकतरफ़ा संपर्क का परिणाम भारतीयों में आत्महीनता के भाव के उदित होने के रूप में हुआ यधपि लाभ भी हुए इसमें संदेह नहीं है। भारतीय पुनर्जागरण के प्रतीक पुरुष राजा राम मोहन राय बेन्थम के उपयोगितावाद से प्रभावित रहे जबकि आधुनिक भारत के राज नेताओं की पहली पीढ़ी अंग्रेजो की स्तुति करते हुए दिखाई देती है । भारतीय और आंग्ल संस्कृति के सबसे सच्चे और आदर्श उदाहरण के रूप में गाँधी जी को देखा जा सकता है । थोरो , तालस्ताय के दर्शन , रस्किन की प्रसिद्ध पुस्तक अन टू द लास्ट तथा बाइबिल के अध्याय सरमन आफ द माउंट के साथ गीता ,उपनिषदों जैन वा बौद्ध शिक्षाओं और राम चरित्र का उन पर कैसा और क्या प्रभाव पड़ा इसे बताने की आवश्यकता नहीं है ।

स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय जनमानस दोहरी आकान्क्षाओ के साथ आगे बढना चाह रहा था । एक तरफ वह भौतिक रूप से समृद्ध होना चाह रहा था तो दूसरी ओर विश्व गुरु कि छवि को जीवित रखते हुए दुनिया को आगे का रास्ता दिखाने का कार्य भी करना चाह रहा था । १९६७ ई॰ तक की नेहरुवादी नीतियाँ इसी भाव को परिलक्षित कर रही थी । जहाँ एक ओर भाखड़ा और भिलाई जैसे कारखाने बनाये जा रहे थे और उन्हें आधुनिकता के मंदिर करार दिया जा रहा था वही दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पंचशील का अनुशीलन किया जा रहा था जो प्राचीन भारत के विचारों को स्वयं में समोए हुए थी और उसी का प्रतिनिधित्व करती थी । गुटनिरपेक्षता की नीति कहीं न कहीं विश्व गुरु की छवि को जीवित रखने का प्रयास थी । इस सारे परिदृश्य में राष्ट्रीय आन्दोलन से सम्बद्ध एक वर्ग ऐसा भी था जो इन स्थितियो को अपने आदर्शो के मुताबिक नहीं पा रहा था । उसकी दृष्टि में स्वराज तो मिल गया था पर सुराज का आगमन अभी तक नहीं हो पाया था । जे ॰पी॰ , बिनोबा और लोहिया आदि इसी वर्ग से सम्बन्धित थे ।

इस तरह नया भारत दो संस्कृतियों के बीच बँटा हुआ था । एक वर्ग आधुनिकता और परंपरा का मेल चाहता था तो दूसरा आधुनिकता की कीमत पर भी परंपरा को जीवित रखना चाहता था । बाद में सर्वोदय आन्दोलन और भूदान आदि के असफल हो जाने से यह सिद्ध हो गया कि नए भारत ने पहले रास्ते को स्वीकार कर लिया है ।किन्तु इस रास्ते में भटकाव की संभावना अधिक थी क्योकि संतुलन का रास्ता संन्यास से अधिक कठिन होता है। इससे एक ऐसी पीढ़ी तैयार हुई जो छद्म जीवन जीती थी , जो करती कुछ थी और दिखाती कुछ और थी । इस तरह एक कचरा संस्कृति निर्मित होने लगी । यह सपूर्ण स्थिति भारतीय दुविधा को दिखा रही थी कि वह किस और जाए और कौन सा रास्ता चुने ?

९० के दशक में एक और बड़ी घटना घटी । भारत का सामना अब अकस्मात् उदारीकरण और वैश्वीकरण से हुआ ।यह प्रक्रिया अपने साथ आर्थिक बदलाव तो ले कर आई ही , सांस्कृतिक रूप से एक बड़े परिवर्तन की वाहक भी बनी । कम से कम जमीनी स्तर पर उदारीकरण का प्रभाव आर्थिक रूप में कम और सांस्कृतिक रूप में अधिक दिखाई देता है । राह चलते नुक्कड़ की पान की दूकान पर जब आप लोक – संगीत की जगह ब्राजील जैसे कैरेबियन गाने की धुन सुनते है या फिर युवा वर्ग में ब्रांडो के प्रति बढती ललक देखते है तो यह सांस्कृतिक रूप से आपको चौंकाने वाली स्थिति होती है । यह सम्पूर्ण प्रक्रिया अत्यंत व्यवस्थित और सुनियोजित ढंग से प्रारभ हुई है और सबसे बड़ी बात कि इसे हमने खुद आमंत्रित किया है । मॉस मीडिया और प्रचार माध्यमो – विज्ञपनो द्वारा एक पूर्णतया उन्मुक्त और भोगवादी संस्कृति हम पर थोपी जा रही है और वह भी इतनी तेजी से कि एक पूरी कि पूरी पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से अजनबी बनती जा रही है । यह संस्कृति ( या अपसंस्कृति ) पहले तो झूठी आवश्यकताएं पैदा करती है और फिर उपभोग को बढ़ावा देते हुए उन्हें एक एसे आदर्श के रूप में प्रस्तुत करती है मानो उनका उपयोग करना ही समकालीन होने या आधुनिक होने की पहली शर्त हो । इस पूरी प्रक्रिया में आपके सामने सिर्फ और सिर्फ साधन प्रस्तुत किये जाते है और साध्य को पूरे दृश्य से बाहर रखा जाता है या फिर प्रयास किया जाता है कि व्यक्ति उसे भूल जाए ।

स्थितियां चेतावनी अवश्य देती है परन्तु पूर्णतया निराशाजनक भी नहीं है । उपभोक्तावाद का यह मायावी चरित्र अभी ऊपरी तौर पर ही उभर पाया है व्यक्तिगत जवाबदेही और नैतिकता आज भी अपनी उपस्थति दर्ज कराती है । इसके पीछे मूलकारण भारतीय समाज में निहित परिवार के प्रति आस्था और आध्यात्म की भावना है । पाश्चात्य उपभोक्तावाद प्राच्य भारतीयता के साथ संतुलन साधने को बाध्य है , यह हमारी संस्कृति की मजबूती का प्रमाण और हमारी संयोजनशीलता और ग्रहणशीलता का धोतक है | वास्तव में यदि इस संक्रमण से विजयी हो कर बाहर निकलना है तो हमें ऐसी वैश्विक संस्कृति निर्मित करनी होगी जो सही अर्थो में मानवीय व अंतर्राष्ट्रीय हो ( यधपि हम उससे पूर्व परिचित है उसे नए रूप में ढलना भर है ) या फिर एक ऐसी प्रतिसंस्कृति निर्मित करनी होगी जो हमारी परम्पराओं और आधुनिकता को साथ – साथ जीवित रखे । शायद वह प्रति संस्कृति निर्माण की प्रक्रिया में हो ।

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